25 जून, 1975 की वह काली रात मेरे देश में दोबारा फिर कभी न आए।

इमरजेंसी यानि आपातकाल एक ऐसी घटना थी जिसने भारत जैसे महान लोकतांत्रिक देश का गला घोंट दिया था। एक ऐसी काली रात जिसने हजारों, लाखों स्वतंत्रता सैनानियों द्वारा दिए गए बलिदानों को सत्ता लोलुपता की आग में झोंक दिया। . . .

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25 जून, 1975 की वह काली रात मेरे देश में दोबारा फिर कभी न आए।

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एक ऐसा राजनैतिक षडयंत्र जिसने राज सत्ता में बने रहने के लिए लाखों लोगों को जेल की काली कोठडी में बंद कर दिया, जिसने अखबारों के मुंह पर ताला लगा दिया। रेडियों को महिमा गान, गुणगान का हथियार बना कर तानाशाही लागू कर दी गई।
देश के युवाओं के लिए, तरूणों के लिए, यह समझना कठिन हो जाएगा, आखिर हुआ क्या था, जो देश में इमरजेंसी लगाई गई और इमरजेंसी में हुआ क्या…?

25 जून, 1975 की अर्धरात्रि में देश तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भारत के राष्ट्रपति श्री वी.वी. गिरी साहब से अपातकाल लगाने के आदेशों पर दस्तखत करा कर बाहर निकलती हैं और देश में हा हा कार चित्कार शुरू हो जाती है।
रात्रि 12 बजे व प्रातः 5 बजे के मध्य जब सारा देश सो रहा था तो लोकतंत्र तानाशाही में बदल चुका था। देश के करोडों लोगों की आजादी समाप्त हो चुकी थी। बोलने की आजादी, लिखने की आजादी, मौलिक अधिकारों की आजादी, सब इमरजेंसी की भेंट चढ़ चुकी थी।
अर्धरात्रि में एक लाख के लगभग नेताओं को पूरे देश में अरेस्ट कर लिया गया।
देश के सारे थाने भग गए, जेलें भर गई, कोई पूछ नहीं सकता था कि क्यों अरेस्ट किया जा रहा है। श्रद्धेेय जय प्रकाश नारायण, श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेई, श्री लाल कृष्ण अडवानी, संघ प्रमुख परम पूजनीय बाला साहब देवरस, नाना जी देश मुख, श्री मोरारजी भाई देसाई, अकाली दल नेता, कम्यूनिस्ट पार्टी नेता, श्रीमती इंदिरा गांधी के विरोधी कांग्रेस नेता, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जन संघ के कार्यकर्ता सब पर ‘मिसा’ (मैंटिनेंस ऑफ इंटरनल स्कयोरिटी एक्ट) लगा कर जेलों में डाल दिया गया।

26 जून, 1975 को न अखबार आया, न रेडियो चला, जिसने किसी चौराहे पर चर्चा की उसे पुलिस उठा कर ले गई, पता चला कि ‘मिसा’ लग गई है।
कुछ महत्वपूर्ण अखबारों ने लिखने की हिम्मत की, उनके छापेखाने बंद करवा दिए गए, संपादको को जेल में डाल दिया गया।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आदेश पर हमने समाचार पत्र छापने का काम शुरू किया। बहुत छोटे स्तर पर साईक्लोस्टाईल मशीन से छोटा अखबार निकालना, उसे रातों रात महत्वपूर्ण लोगों के घरों में डालना, बहत बडा जोखिम का काम था।

गऊशाला के पीछे एक कमरे में घास फूस के मध्य साईक्लोस्टाईल मशीन रख ली गई, वहीं पर अपनी चारपाई डाल दी गई। बस फिर क्या था जो भी समाचार इधर-उधर से आते, उन्हें रात में छापना, प्रातः चार बजे से पहले कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के बुद्धिजीवि लोगों के घरों में डाल देना, हरियाणा पुलिस की नींद हराम हो गई।
धडाधड़ लोग पकडे जाने लगे, एक के बाद एक संघ के स्वयं सेवकों की जमकर पिटाई होने लगी श्रीमती इंदिरा गांधी की तानाशाही जो थी, एक महीना तक यह पकडने, पीटने और जेल में डालने का काम चलता रहा। इस कडी में 54 लोगों पी ‘डीआईआर’ (डिफेस इंडिया रूल) लगा कर झूठे मुकदमें बना कर जेल में डाल दिया गया।
अन्तोत्गत्वा मेरी भी बारी आ ही गई । शायद किसी कार्यकर्ता ने अपनी जान बचाने के लिए सारा राज उगल दिया था। पुलिस ने मुझे प्रिंटिग मशीन, अखबार के बंडलो के साथ धर दबोचा, फिर क्या था जमकर 15 दिन थाना कुरूक्षेत्र में धुनाई हुई और ‘डीआईआर’ में झूठा मुकदमा बनाकर करनाल जेल में डाल दिया गया।
ऐसा एक लाख लोगों के साथ हुआ। देश जेल में बदल गया था। पर सवाल खडा होता है कि ऐसा क्यूं हुआ ..? सिर्फ अपनी राजसत्ता को बचाने के लिए कांग्रेस पार्टी की नेता, पंडित जवाहर लाल नेहरू जीे की बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र की हत्या कर दी।
लखनऊ उच्च न्यायालय ने इंदिरा जी का चुनाव अयोग्य घोषित करार दे दिया था। उन्हें गद्दी छोडनी पडती थी, देश बर्बाद हो जाए, हजारों लाखों देश भक्तों की त्याग, तपस्या, बलिदान समाप्त हो जाए, परन्तु इंदिरा जी की गद्दी न जाए। इसके लिए मेरा देश 21 महीने करागार में बंद रहा, करोडों देश वासी अपने घरों में थे परन्तु गुलाम थे, बोल नहीं सकते थे, दीवरों के भी कान थे, कब पुलिस पकड कर ले जाएगी, कानून गिरवी रख दिया गया, देश को गुलाम बना दिया था।

उफ, 25 जून, 1975 की वह काली रात मेरे देश में दोबारा कभी न आए।

डॉ राजीब बिन्दल
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, 2025
हिमाचल प्रदेश।

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