‘‘राम भक्त दुबले पतले संत जब बने मार्गदर्शक’’

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  मन्दिर में 500 से अधिक कार सेवक ठहरे हुए थे। जलपान-भोजन के साथ-साथ हाल-चाल का भी पता लगा कि मुलायम सिहं ने पूरी व्यवस्था की है, परिन्दा भी पर न मार सके। लाखों कार सेवको को सरयु नदी के उस पार रोक रखा गया था, लाखों कार सेवक अयोध्या जी के हर अखाडे में, मन्दिरों में, घरो में उपस्थित होकर, मन्दिर की और कूच करने की तैयारी में थे।

  हमारा रक्त भी ठाठे मारने लगा कि कैसे हम जल्द अयोध्या पहुंच जाएं। मन्दिर के परांगण में पीपल के पेड के चौतरे पर खडा हो कर मैने आवाज लगाई-

   ‘‘जो -जो अयोध्या जाना चाहते है वे यहां आ जाए…!’’

   ऊर्जा सी चमक लोगों की आखों में दिखी। 30 लोग हमारे व 45 लोग अन्य तैयार हो गए। एक भगवा वस्त्रधारी दुबला पतला सा सन्त दौड कर आया और कहा-

  ‘‘रास्ता मैं बताऊगा, 200 किलोमीटर से ज्यादा चलना होगा। वही तैयार हों जो चल सकते है…।’’

  फिर क्या था, जय श्री राम का उदघोष हुआ। पुनः 4-4 के ग्रुप बनाए व 16-16 के 5 ग्रुप बनाए गए और उस सन्त के पीछे पैदल चल पडे। देखते ही देखते उन्होंने ने हमें रेलवे ट्रेक पर पहुंचा दिया। अब तो अनावरत् चलना ही था। 7-8 घण्टे निरन्तर चलने के बाद कुछ कार सेवको की हिम्मत जैसे टूटने लगी थी। पैरो में छाले पडने लगे, परन्तु श्री राम के नाम की महिमा अपरमपार। तभी एक ट्रेन की आवाज सुनाई दी।

  उन सन्त महोदय ने कहा, माल गाडी होगी। हमें प्रयास करने चाहिए उसे रोकने का। फिर क्या था, राजस्थान के कुछ युवक जो शायद ट्रेनों में सफर करने के अभ्यस्त थे, आगे बढे और एक ने अपनी लाल रंग की कमीज खोल दी और उसे हवा मे हिलाया। देखते ही देखते माल गाडी रूक गईर्। इंजन चला रहे ड्राईवर को पूछा, हम लोगो को अयोध्या जाना है, कुछ दूर तक ले चलो..? चालक डर गया, उसने चढाने से मना कर दिया।

  राजस्थान के कार सेवकों ने तुरन्त मोर्चा सम्भाला। कुछ इंंजन के उपर चढ गए। कुछ हार्स पाईप पर और हम सभी को इशारा किया कि हम मालगाडी के डिब्बो मे कूद जाएं। देखते ही देखते एक दूसरे का हाथ पकडते हुए सभी डिब्बे में कूद गए। थोडी ही देर बाद गाडी रूक गई। इशारा हुआ कि हमें उतरना होगा, उतर कर जानकारी मिली कि किसी अन्जान जगह में हमे उतार दिया गया था।

   वे सन्यासी फिर आगे बढे और हमे खेतों की ओर ले चले। पैदल चले अब तक 14 घण्टे बीत चुके थे, भूखे प्यासे कार सेवको का दम टूट रहा था। पेरो के छाले, टागों की थकावट, पेट की भूख आगे बढने से रोक रही थी। चलते-चलते जैसे मानो राम जी की सेना सामने आ गई। कुछ गांव के युवक आए, उन्होने पूछा कार सेवक हैं ? फिर क्या था, जय श्री राम के नारे गूंजने लगे। वे हमें कुछ दूर गांव के पास तक ले चले और वहां बैठने को कहा। देखते ही देखते 10-15 महिला-पुरूष हाथों मे कुछ खाने का सामान ले कर पहुंचे।

  ताजे गुड के गोल-गोल लड्डू और साथ मे चावलों के बने हुए मुरमुरे, यह कार सेवकों को पतलो मे परोसे गए। कार सेवको की आँखों से प्रेम के आंसू उमड़ पडे़। श्रदा भाव से भोजन प्रशाद ग्रहण किया। उन्होने ही हमें कहा कि अभी रात्री का समय हो गया है आपको हम सरयू नदी पार करा देंगे अन्यथा पुलिस पार नही करने देगी।

  हमें एक बहुत बडी लकडी की ‘लोकल मेड’ नाव में पार कराने के लिए ट्रेक्टरकी ट्रालियो में बैठाया गया। सरयू के किनारे नाव में चढाया गया और दूसरे छोर पर उतार कर नाव वापिस चली गई। सभी कार सेवको के आंसू छलक गए, भाव विभोर हो कर रूंधे हुए गले से सभी ने जय श्री राम का उदघोष कर धन्यवाद दिया।

  सभी नई उंमग से भर कर चल पडे थे। हमें ऐसा बताया गया था कि आभी 7 से 8 घण्टा पैदल में और लगेंगे। रात्री के अन्धेरे मे ग्रामीण मार्गदर्शक के साथ चलते चले गए और अर्धरात्री भी निकल गई थी। 3 बज चले थे कि हमने देखा कुछ ग्रामवासी हमारी ओर आ रहे है। पुनः संवाद हुआ, जय श्री राम का उदघोष हुआ और वे हमें अपने साथ गांव की चौपाल मे ले गए।

-डॉ. राजीव बिन्दल

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