संघ के संस्कार और नीयती मुझे वनवासी कल्याण केन्द्र, झारखंड ले गई
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संघ के संस्कार और नीयती मुझे वनवासी कल्याण केन्द्र, झारखंड ले गई
आज एक लम्बे अरसे के बाद, यादें पुनः ताजा हो रही हैं। अवसर है वनवासी कल्याण केन्द्र गोयलकेरा के छात्रावास के नए भवन के उद्घाटन का। वर्ष 1978 में जी.ए.एम.एस. की डिग्री प्राप्त करने के बाद स्वाभाविक रूप से मैडिकल प्रैक्टिस करने का मन बन रहा था और तैयारी भी हो रही थी।
एकाएक माननीय श्री नारायण दास जी, जो उस समय के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक थे, हमारे सोलन स्थित घर पर पहुंच गए। माननीय नारायण दास जी एक ऐसे महापुरूष थे जो आजीवन व्रती प्रचारक रहे और विद्या भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे, उनका निरन्तर हमारे परिवार में आना-जाना था।
जब… मैं झारखंड के आदिवासी क्षेत्र में सेवा के लिए रूखसत हुआ…
माननीय नारायण दास जी ने मेरे पूज्य पिताजी स्व. वैद्य बालमुकंद जी से आग्रहपूर्वक एक डॉक्टर अपने परिवार में से आदिवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य के लिए प्रचारक के रूप में ले जाने का पूरजोर आग्रह किया। मैं अभी-अभी मैडिकल की पढ़ाई करके आया था, मेरे बड़े भाई डॉक्टर रवि बिन्दल भी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई कर चुके थे और उनसे बड़े भाई डॉ. राम अवतार बिन्दल भी 2 वर्ष पूर्व जी.ए.एम.एस. करके घर लौटे थे।
माननीय नारायण दास जी ने कहा कि देश के आदिवासी क्षेत्रों में भारी मात्रा में धर्मांतरण हो रहा है। वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से देश के सभी क्षेत्रों में सेवा कार्य शुरू किए जा रहे हैं। ऐसे ही सेवा कार्यों के लिए मुझे आपके परिवार से एक डॉक्टर लेकर जाना है। घर पर रात भर चर्चा चलती रही।
हमारी पूज्य माताजी किसी को भी भेजने के सख्त खिलाफ थी, परन्तु परिवार में संघ के संस्कार कूट-कूट कर भरे थे और पिताजी ने निर्णय लिया कि इस सेवा कार्य के लिए डॉ. राजीव बिन्दल को ले जाएं और अगले दिन प्रातःकाल 9 बजे ही मेरी विदाई आदिवासी क्षेत्रो में सेवा कार्य करने के लिए कर दी गई।
इस निर्णय ने मेरे जीवन को एक नया मोड़ प्रदान किया। 1975 में आपातकाल का विरोध करने के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने मुझे करनाल जेल में ठूंस दिया था। जेल से निकलने के बाद ये लगभग तय माना जा रहा था कि मैं मैडिकल प्रैक्टिस करते-करते राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाऊँगा परन्तु संघ के संस्कार और नीयती का निर्णय मुझे वनवासी कल्याण केन्द्र झारखंड ले गया।
घोर जंगलों के मध्य ‘‘हो’’ जनजातीय क्षेत्र का बहुत छोटा सा गांव
जहां मुझे चिकित्सालय शुरू करने का आदेश हुआ
दृष्टि पटल पर वो एक-एक दृश्य अंकित होता जा रहा है जब मैं सिंघभूम जिला के कदम डिहा नाम स्थान पर श्री मूरंग सिंह पूर्ति, पूर्व लोकसभा सांसद के घर पहुँचा। घोर जंगलों के मध्य ‘‘हो’’ जनजातीय क्षेत्र में स्थित ये बहुत छोटा सा गांव जहां मुझे चिकित्सालय शुरू करने का आदेश हुआ और साधारण से जीवन के साथ उस आदिवासी समाज को आत्मसात करते हुए सेवा प्रकल्प की शुरूआत हुई।
काबिलेगौर है कि उन दिनों ये क्षेत्र झारखंड नहीं था अपितु दक्षिण बिहार का सरंडा का जंगल था जहां मेरा पहला सेवा कार्य प्रारंभ हुआ। न भाषा की जानकारी, न खान-पान का सामंजस्य परन्तु ये वनवासी बंधु भारत माता के पुत्र-पुत्रियां हैं जिनके दुख-दर्द सांझा करते हुए समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का महान लक्ष्य लेकर कार्य शुरू हुआ।
शनैः शनैः कार्य विस्तार हुआ और कदम डिहा से आगे बढ़कर कुईड़ा में चिकित्सालय शुरू किया जो थोड़ा बड़ा स्थान था और तत्पश्चात गोयलकेरा में चिकित्सालय शुरू किया। हरियाणा से मिली यजदी जावा मोटरसाईकिल पर आदिवासी क्षेत्रों में घूम-घूमकर चिकित्सा के माध्यम से सेवा की अलख जगाई और कल्याण आश्रम का कार्य बढ़ने लगा।
पिता जी झारखंड के गोयलकेरा आए और मुझे अपना आशीर्वाद दिया
मेरे पूज्य पिताजी स्व. वैद्य बालमुकन्द जी मेरे कार्य को देखने के लिए सोलन से चलकर गोयलकेरा पहुंचे। काम को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और इलाके की दुर्दशा को देखकर हृदय से व्यथीत भी हुए। मुझे बैठाकर पूछा कि अब और क्या कार्य आपको यहां करना है। जैसा कि कल्याण आश्रम में निर्णय हुआ था कि हमें गरीब आदिवासी बच्चों का एक छात्रावास गोयलकेरा में शुरू करना है, ऐसा मैंने पिताजी से कहा। तुरन्त उन्होंने कहा कि शुरू करो देरी किस बात की है।
मैंने कहा कि धन की व्यवस्था होने तक हमें इंतजार करना पड़ेगा। फिर पिताजी ने कहा कि आप काम शुरू करो व्यवस्था हो जाएगी। मुझे पूछा कि कितने बच्चों का छात्रावास शुरू करना है और क्या राशि व्यय होगी। मेरा उत्तर था कि 20 बच्चों का छात्रावास शुरू करेंगे और लगभग एक लाख रूपए प्रतिवर्ष व्यय होगा (1979 में एक लाख रूपए बहुत बड़ी राशि होती थी)।
मैं फिर भी नहीं समझा कि पैसा कहां से आएगा। पिताजी ने कहा कि तुम काम शुरू करो मैं सोलन जाते ही तुम्हें अपेक्षित धन भेज दूंगा और प्रयास रहेगा कि आपको हर साल यह धन मेरी ओर से आता रहे। फिर क्या था पिताजी के जाने के तुरन्त बाद मैंने छात्रावास की तैयारी शुरू कर दी और देखते ही देखते 20 बच्चों का सेवा केन्द्र खड़ा हो गया। मेरे सोलन आने के बाद भी वो चिकित्सालय, छात्रावास व अन्य सेवा कार्य वनवासी कल्याण आश्रम के तत्वाधान में चलते रहे और आज भी चल रहे हैं। सौभाग्य की बात यह है कि 1980 से लेकर 2001 तक निरन्तर उस छात्रावास का शत-प्रतिशत व्यय बिन्दल परिवार से जाता रहा।
प्रभु श्रीराम जी और भगवान बिरसा मुंडा जी के आशीर्वाद से आज यह छात्रावास 200 विद्यार्थियों का हो गया
6 महीने पहले से गोयलकेरा छात्रावास से फोन और व्ह्टसअप पर कुछ फोटोग्राफ्स आने शुरू हुए जब उस छात्रावास में 200 बच्चों का छात्रावास भवन बनाने का कार्य शुरू हुआ। गुजरात के एक दंपति ने यह पुण्य कार्य अपने हाथ में लिया और 200 गरीब आदिवासी बच्चों के छात्रावास भवन निर्माण कार्य को पूर्ण कर दिया।
यह जानकार मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था कि जो सेवा कार्य आज से 46 वर्ष पूर्व मेरे हाथों से प्रारंभ हुआ, मेरे पिताजी के आशीर्वाद से शुरू हुआ, आज वो 200 बच्चों की सेवा करने की क्षमता वाला आश्रम बन चुका है।
मुझे सौभाग्य मिल रहा है कि 4 दशक बाद झारखंड के गोयलकेरा छात्रावास आश्रम के नवनिर्मित भवन के उद्घाटन अवसर पर मैं अपनी पत्नी श्रीमती मधु बिन्दल के साथ 10 मार्च को शामिल होने जा रहा हूँ। ये पल मेरे लिए जीवन की सर्वाेच्च खुशी प्रदान कर देने वाला पल है जब मेरी पूज्य माताजी स्व. श्रीमती भागवंती बिन्दल के नाम से चलने वाले छात्रावास के सेवा कार्य में भारी वृद्धि होगी और मैं उस उद्घाटन का साक्षी बनूंगा।
कल्याण आश्रम में कार्य करने से मेरे जीवन की दिशा समाज सेवा की ओर मुड़ी और वो सेवा का भाव सदैव मन में बना रहता है। इस अवसर पर कल्याण आश्रम के संस्थापक नमन करता हूँ।
कल्याण आश्रम के संस्थापक बाबा साहेब देश पांडे जी को नमन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघ चालक परम पूजनीय श्री माधव सदाशिवराम गोवलकर ‘‘गुरूजी’’ को वंदन करता हूँ जिनकी प्रेरणा से वनवासी कल्याण आश्रम प्रारंभ हुआ।
संघ के सभी प्रचारकों को नमन करता हूँ जिन्होनें इस पवित्र कार्य को करने की हमें प्रेरणा दी और सर्वाधिक श्रद्धा का भाव पूज्य पिताजी और माताजी के श्रीचरणों में शीश नवाकर प्रस्तुत करता हूँ।
-डा. राजीव बिन्दल






























































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