‘‘लालच वश, चील के वृक्षों का सीना तो छलनी न करो भाई’’

चील के जले हुई ठूंठ, टूटी शाखाएं और बिरोजा के लिए चील के तन का भेदन, निः संदेह यह सब पर्यावरण के लिए तो खतरा हैं ही साथ ही मनुष्य के बढ़ते लालच को भी बयां करते हैं। हम जानते हैं चील के जंगल हम इंसानों के लिए कितने जरूरी हैं। चील के जंगलों की शुद्ध वायु हमारे श्वासों के लिए कितनी लाभप्रद हैं, यह मैडिकल साईंस में सिद्ध हो चुका है।

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‘‘लालच वश, चील के वृक्षों का सीना तो छलनी न करो भाई’’

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      चील के जले हुई ठूंठ, टूटी शाखाएं और बिरोजा के लिए चील के तन का भेदन, निः संदेह यह सब पर्यावरण के लिए तो खतरा हैं ही साथ ही मनुष्य के बढ़ते लालच को भी बयां करते हैं। हम जानते हैं चील के जंगल हम इंसानों के लिए कितने जरूरी हैं। चील के जंगलों की शुद्ध वायु हमारे श्वासों के लिए कितनी लाभप्रद हैं, यह मैडिकल साईंस में सिद्ध हो चुका है।

        विश्व पर्यावरण दिवस व आने वाले वन महोत्सव के मध्य, मैं आप सबके साथ कुछ ऐसी तस्वीरें शेयर कर रहा हूं, जो हिमाचल प्रदेश के जंगलों  का भविष्य और सूरत-ए-हाल बयां कर रहे हैं।

         हम सब जानते हैं, चीड़ के जंगलों में बिरोजा प्रारम्भ से ही निकाला जाता रहा है, यह हमारी जरूरत भी है और प्रक्रिया भी। पर तब, चीड़ के पेड़ से बिरोजा निकालने का कार्य अत्यंत सावधानी से किया जाता था, ताकि पेड़ को कोई नुकसान न पहुंचे और हमारी जरूरत भी पूरी हो जाए। एक-एक पेड़ पर सावधानी से बिरोजा निकालने के लिए ‘‘कप’’ लगाया जाता था, जब वह भर जाता था तो दूसरा लगाया जाता था।

           किन्तु जैसे-जैसे मनुष्य का लालच बढ़ता चला गया, चील के पेड़ पर लगने वाले कपों की संख्या और चील के वृक्ष में लगने वाले ‘‘टकों’’ की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। लालच इतना प्रबल हुआ कि मनुष्य ने पेड़ को चारों ओर से छील कर बिरोजा निकालना शुरू कर दिया, बिना यह विचार किए कि यह कृत्य किसी वृक्ष की हत्या करने जैसा ही है।

          समय-समय पर हमारी सरकारों ने पर्यावरण को संरक्षित रखने और वनों को बचाने की करोड़ो की योजनाएं बनाई, वन विभाग का अमला बढ़ता चला गया। वनों के संरक्षण के नाम पर चीफ कंजरवेटर, कंजरवेटरों की संख्या बढ़ती चली गई और साथ ही पेड़ों  का सीना छलनी करने और उन्हें आघात पहुंचाने का कार्य भी बढ़ता चला गया।

           हर वर्ष,  आग रोकने के लिए मुहिम चलाई जाती रही, करोड़ों रुपये का व्यय किया गया परन्तु  आग से प्राभावित, सर्वाधिक चील के जंगलों में बिरोजा तो जैसे पेट्रोल का काम करता गया।

           हर साल आग लगती है, चील के पेड़, बिरोजा वाले जो स्थान से जल जल उठते हैं, हवा, तुफान, बरसा आती है, पेड़ टूट जाते हैं, फिर सड़ जाते हैं। अगले साल फिर आग लगती है, वह सड़े हुए पेड़ उस आग में स्वाह हो जाते हैं और बड़ी आगजनी का कारण बनते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान होने के साथ ही हमारे निरीह पशु-पक्षियों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है।

           चील के जंगल लगातार टूटे हुए, सड़े हुए, जले हुए हर स्थान पर दिखाई देंगे। यह गाथा केवल जिला सिरमौर की ही नहीं होगी, अन्य स्थानों पर भी ऐसा होगा। यह फोटो जिला सिरमौर के जंगलों की है।

              लक्ष्य केवल समाधान की ओर ध्यान आकर्षित करने का है।

            हम नये वृक्ष जरूर और निरंतर लगाए पर जो वृक्ष सालों साल जंगलों की शान बनकर खड़े हैं, उनका संरक्षण भी तो जरूरी है, ठीक वैसे,  जैसे हम घर के किसी बड़े-बुजुर्ग का सम्मान करते हैं, उनकी देख-रेख करते हैं।

-डा. राजीव बिन्दल

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