श्री राम जन्म भूमि आंदोलन

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  वह दृष्य महाभारत के युद्व के बाद का भयावह जैसा था…

  जिस समय पीछे हटने की घोषणा हुई उस समय मैने अपने आपको सबसे आगे की पंक्ति में पाया। प्लास्टिक की गोलियों की बौछार से मेरे साथ वाला कार सेवक सड़क पर गिरा, मैं उसे उठाने के लिए झुका ही था कि एक भारी भरकम हथौडे जैसा हाथ मेरी पीठ पर पडा। मैं कुुछ सोच पाता, उसने पूछा कौन हो…? मैने पीछे मुड कर देखा कोई पुलिस का बड़ा आफिसर था। बरबस मेरे मूंह से निकला -डाक्टर हूं घायलो को देख रहा हूं।

  बस इतना कहने की देर थी कि उसने सिपाहियों को चिल्ला कर कहा कि ये ही है लीडर। लो उठा कर चलो इसे। चार-पांच हाथ मेरी ओर बढे और जैसे अनाज की बोरी को उठाते है वैसे उठा कर एक जीप मे फैंक दिया। जीप अयोध्या की सडकों पर से होती हुई फैजाबाद जेल की ओर चल पडी। सडकों पर सब ओर कार सेवकों के पिटठू, कपडे, जूते, चप्पलें बिखरी हुए थीं। गिरे पडे घायल कार सेवकों को गाडियों मे डाला जा रहा था।

  ऐसा प्रतीत हो रहा था कि महाभारत के युद्व के बाद का भयावह दृष्य हो। देखते ही रूह काॅप रही थी, न जाने कितनी माताओ  के सपूत बलिदान हो चुके शायद  होंगे। सब ओर मातम् पसर गया था। कुछ ही मिनटो में हमे फैजाबाद जेल के गेट पर पहुॅचा दिया गया। हमें जेलर के हवाले करके जीप वापिस चली गई। हमने देखा कि कुछ लोग और वहां बैठाए गए थे।

  कुल मिलाकर हम केवल 19 लोग बचे। लाखों की भीड को तित्तर-बित्तर कर दिया गया। हजारों घायल हुए, अनेकों वीरगति को प्राप्त हुए। हम 19 लोग न जाने कैसे बच गए। यही विचार मन मे चल रहा था, हमें भी गोली मारी जा सकती थी। किस शक्ति के आदेश से हमे उठाकर जीप में पटका गया, यह पहेली आज तक अनबुझी है…!

  हम लोगों को जेल की बैरक में भेज दिया गया, कोई एफ.आई.आर. नहीं, कोई मुकदमा नहीं, बस मुलायम सिंह की तानाशाही थी।

  राम जन्म भूमि का आन्दोलन शान्त हो चला। लाखों लोग जो पूरे उत्तर प्रदेश की जेलों मे थे, उन्हे छोड़ दिया गया। हम भी इन्तजार करने लगे कि हमें कब छोडा जाएगा। जेलर से पूछा करते, वे कहते अभी कोई आदेश नही आया है। दिन बीतते गए, मेरे पास केवल पहनी हुई एक पैन्ट-कमीज व एक ही बनियान-अंडर वीयर था। कोई पैसे नहीं, कोई अपने घर परिवार मित्रों-दोस्तों, कार सेवको से सम्पर्क संवाद नहीं।

  पैंट कमीज प्रति दिन धो देते, धूप में सुखाकर खुद भी बैठ जाते। जब बदन भी सूख जाता, कपडे भी सूख जाते, उन्हे पहन लेते।

  सोलन के हमारे साथी कार सेवक सोलन पहुंच गए। बडे भाई साहब भी सोलन पहुंच गए। मेरा पिटठू भी मेरे साथी कार सेवक ने घर पहुंचा दिया। बस फिर तो घबराहट व चिन्ता का दौर परिवार में शुरू हो गया। सब ओर तलाश शुरू की गई (यह सब मुझे वापिस आने पर मालूम हुआ)

  एक माह बीत गया, फैजाबाद जेल में अब तो दाढी मूंछ सिर के बाल सब बेतरतीब हो चले थे। एकाएक जेलर का सन्देश आया। हम जेलर के कमरे मे पहुंचे, उसने कहा आप लोग जा सकते हैं। जाने की खुशी का अहसास पुनः प्रश्न में बदल गया। भई हम जाएंगे कैसे, कोई पैसा कोई और साधन नहीं।

  हमारी बाजू पर एक स्टैम्प लगा दी गई और कहा गया कि जिस ट्रैन मे आप जाएंगे मात्र स्टैम्प दिखाने से आपको जाने दिया जाएगा। उस स्टैम्प को दिखाते हुए मै अम्बाला रेलवे स्टेशन पर पहुॅच गया। छोटी बहन का लैण्ड लाईन नम्बर याद था। एस.टी.डी. बूथ वाले से कहा, भाई पैसे नही है एक फोन करने दो।

  देखते ही देखते छोटी बहन सभी रिश्तेदारो को लेकर स्टेशन पहुंच गई। सब लोग तलाश मे लगे हुए थे। उनके पहुंचते ही मिलन आंसूओं के सैलाब में बदल गया। दाढी वाला राजीव पहली बार देखकर सब अश्चर्य चकित थे। सोलन पहुंच कर महीनों तक अयोध्या का वो भयावह दृष्य, कार सेवकों के शव, घायल राम भक्त, आखों के आगे घूमते रहे।

  आज भी सारा दृष्य आखों के सामने आते ही आत्मा सिहर उठती है।

  5 अगस्त का दिन मन को सकून दे रहा है, लाखों कार सेवको का बलिदान यथार्थ हुआ.!!

-डॉ. राजीव बिन्दल

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