योग शब्द - वेदों, उपनिषदों, गीता एवं पुराणों में अति प्राचीन काल से व्यवहार में आया है -डा. राजीव बिन्दल

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योग शब्द – वेदों, उपनिषदों, गीता एवं पुराणों में अति प्राचीन काल से व्यवहार में आया है। भारतीय दर्शन में योग एक अति महत्वपूर्ण शब्द है। आत्म दर्शन एवं समाधि से लेकर कर्मक्षेत्र तक योग का व्यापक व्यवहार हमारे शास्त्रों में हुआ है।

  • महर्षि पतंजलि योग शब्द का अर्थ चित्तवृत्ति का निरोध करते हैं।
  • महा ऋषि व्यास योग शब्द का अर्थ समाधि करते हैं।
  • सयंम पूर्वक साधना करते हुए आत्मा का परमात्मा के साथ योग करके समाधि का आनंद लेना योग है।

ऋषि-मुनियों ने योग की अलग-अलग प्रकार से व्याख्या की है जो अनंत है। हजारों-लाखों PHDs’ योग पर हो सकती हैं परंतु हमें अष्टांग योग को धारण करने से अपना सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए जीवन का कल्याण कर सकते हैं।

अष्टांग योग – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि। इनमें से हम दो विषयों पर ही जन सामान्य चर्चा-वार्ता करते हैं। वह है, आसन एवं प्राणायाम।

आसन एवं प्राणायाम से हमारे शरीर के हर हिस्से में सही प्रकार से रक्त का संचार होता है। शने: शने: हमारी मांसपेशियां, सनायु एवं तंतु सभी सक्रिय होकर शरीर से दोषों का निर्हरण करते हुए शरीर दोषमुक्त होने लगता है। मांसपेशियों का संकुच्चन एवं प्रसारण होने से रक्त संचार पूर्णरूपेण होता है।

मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थों का वर्णन है। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष – इन चारों पुरूषार्थों का आधार है-शरीर, यदि शरीर लगातार लम्बे समय तक स्वस्थ रहता है तो ही चारों पुरुषार्थों को साधा जा सकता है। इसलिए स्वस्थ शरीर ही आधार है।

सुश्रुता संहिता के अनुसार स्वस्थ शरीर का वर्णन है :-

समदोष: समाग्निश्च समधातुमलक्रिय: ।

प्रसन्नात्मेन्द्रियमना: स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥

अर्थात – जिस मनुष्य के दोष सम हैं, जिस मनुष्य की अग्नियां सम हैं, जिस मनुष्य की धातुएं सम हैं, मल क्रियाएं सम हैं, व जिसकी आत्मा, इंद्रियां व मन प्रसन्न है, वही स्वस्थ है। यह सब कुछ योग (अष्टांग योग) से संभव है।

-डा. राजीव बिन्दल

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